Saturday, April 25, 2020

घर के पहले कंप्यूटर का आगमन ( remembering our very first computer)

एक बेहद रोचक घटना याद आ गयी लगभग 18 -19 साल पहले की।।।

    पहली बार कंप्यूटर मैंने 17 वर्ष की उम्र में इंटरमीडिएट करते टाइम देखा था वो भी जब रिजल्ट्स ऑनलाइन आने शुरू हुए तब। बहुत ही प्रभावित था मै। एक 15 इंच का ब्लैक एंड वाइट मॉनिटर, CPU , intex  के स्पीकर्स, सब कुछ एकदम हाई टेक लगता था। साइबर कैफ़े वाले लोग तो एकदम भोकाल में ही रहते थे। पूरे 40 rs घंटा चार्ज करते थे। एक हिंदी मीडिअम से पढ़ रहे लड़के के लिए तो बेशक हाई टेक चीजें थी वो।

    घर में कंप्यूटर आने का संजोग कुछ ऐसा हुआ की बड़ी बहन का एडमिशन कंप्यूटर इंजीनियरिंग ब्रांच में हुआ और उसके एक साल बाद घर में एक नया कंप्यूटर आ गया। चूंकि बहन कॉलेज में थी इसलिए कंप्यूटर उसके नाम पे लिया गया था। इस बात से मै तो इतना खुश था की कंप्यूटर के आते ही मध्यम वर्ग के रिवाजों के मुताबिक उसकी पूजा में ३-४ आरती गा डाली। बाकायदा मॉनिटर पर तिलक लगाया गया। उन दिनों किसी भी चीज पर कवर चढाने का चलन बहुत था, फिर तो कंप्यूटर साहब को कपडे भी अपने मिल गए।

    समस्या यह थी की पूरे परिवार के लिए ये एकदम नयी चीज थी और हम लोगो में से किसी को कंप्यूटर चलाना नहीं आता था। डर लगता था कि कुछ भी गलत किया तो कही खराब  ना हो जाए। लाये तो थे सीखने के लिए ही, लेकिन अभी उस काम के लिए उपयोग नहीं हो रहा था। कुछ और तो करने को था नहीं, जान पहचान वालो में 1 -2 लोगों के घर में कंप्यूटर पहले से था तो मै उनके घर जाके या उनको अपने घर बुला के फिल्में, वीडियो गाने, फ्री वाले सॉफ्टवेयर्स, फ़्लैश गेम्स और वाल पेपर्स लाके अपने ( मतलब मेरे घर के) कंप्यूटर में कॉपी करवा लेता था। आखिरकार कंप्यूटर में पूरे 40 GB की हार्ड डिस्क थी।

    कंप्यूटर के आने के कुछ दिनों बाद ही एक शाम को लगभग ७ बजे पापा कहीं से एक कवि सम्मलेन की CD ले आये, उन्होंने CD मेरी बहन को दे कर बोला ' इसको कॉपी कर दो मै कल वापस कर दूंगा, फिर बाद में देखेंगे।' 

उसने CD को CD ड्राइव में इन्सर्ट किया और मुझे बुलाया, 'इसको कॉपी करो। पापा को ये वापस देनी है।'

'हम्म' बोलकर मैं कंप्यूटर के सामने ऐसे बैठा जैसे आईटी इंजीनियर बन गया हूँ और ये पता नहीं क्या छोटा मोटा काम देते रहते हैं।

थोड़ा देर ट्राई किया फिर समझ में आया की कॉपी तो मैंने खुद से कभी आज तक किया ही नहीं। अब तक जो कुछ भी फिल्म गेम्स कॉपी हुए वो दूसरों ने किये थे। थोड़ी देर और कोशिश करता रहा।

तब तक पापा आ गए, 'क्या हुआ कॉपी हुआ या नहीं ?'   

'अभी तक तो नहीं हुआ है, मै शायद भूल गया हूँ कैसे करते हैं।' 

'कोशिश करो, देखो कहाँ से पन्ने उड़ते हैं, वही तो बस करना है।'

करना तो वही था। लेकिन नहीं पता कैसे।

'कुछ समझ नहीं आ रहा पापा, लगता है कंप्यूटर खराब हो गया है/'

'अरे अभी आये 2  महीने ही तो हुए हैं, वारंटी भी है, ऐसे कैसे खराब हो गया?' पापा चिंता में पड़ गए।

मैंने समझाया 'खराब तो नहीं होना चाहिए, किसी से पूछ लेते हैं।'

रात को 9 :00  बजे हम दोनों बाइक से एक जान पहचान में गए, उनके सातवीं में पढ़ रहे बच्चे ने हमारी प्रॉब्लम सुन के सीधे अपना कंप्यूटर खोला और कॉपी पेस्ट करके दिखा दिया। 

ओह ये मै कैसे भूल गया। इतना ध्यान नहीं रहा मुझे, मैंने सोचा। चाय पी कर हम दोनों चुपचाप वापस आ गए। 

वापसी में पापा बोले 'यह तो अब  मै भी कभी नहीं भूलूंगा, और उम्मीद है कि तुम कंप्यूटर पूरी तरह से चलाना सीख लोगे।'


इस बात को अब याद करके होठों पर मुस्कान छा जाती है। हालां कि तब इतना करना ही बहुत बड़ी बात थी ।